सम्राट और साधू
तेईस सौ वर्ष पहले की बात है। यूनानी विजेता सिकन्दर तुर्की आदि देशोंको रौंदता हुआ पंजाब और सिन्ध प्रान्त में पहुँच गया। उसके साथ साठ हजार की फौज थी, जिसमें प्रशिक्षित घुड़सवार, तीरन्दाज और पैदल सैनिक थे। इनके पास बेहतरीन किस्मके तीर-धनुष, भाले और तरह-तरह के नये हथियार थे। सिकन्दर वर्षों पहले यूनान से रवाना हुआ, कहीं भी पराजय नहीं देखी, इसलिये मनोबल ऊँचा था । पंजाब में उस समय पुरु नामका पराक्रमी और वीर राजा था। वह औरों की तरह सहज में ही परास्त न किया जा सका। अनेक प्रकार के छल-कपट और देशद्रोही सैनिक अधिकारियों से भेद लेकर सिकन्दर ने उसके राज्य को जीत लिया। वहाँ की व्यवस्था करने के बाद वह पाटलि पुत्र, मगध और वैशाली की ओर बढ़ना चाहता था, जो उन दिनों भारत के समृद्धतम राज्यों में थे।
इसी बीच उसने सुना कि रावी के तट पर एक त्रिकालदर्शी महात्मा रहते हैं। सिकन्दर के मन में उनसे मिलने की इच्छा हुई। दूसरे दिन अपने कुछ अधिकारियों को उन्हें बुलाने के लिये एक सुसज्जित रथ के साथ भेजा। साधु के आश्रम पर पहुँचकर उन्होंने सिकन्दर का सन्देश सुनाया। महात्मा जी ने कहा कि भाई ! मैं यहाँ वन में रहकर जितना हो पाता है, परमात्मा के चिन्तन में लगा रहता हूँ । राजा-महाराजाओं को मुझ जैसे व्यक्तियों से भला क्या काम ? सेना के अधिकारी पशो पेश में पड़ गये। सम्राट् सिकन्दर महान् के निमन्त्रण को आज तक किसी ने अस्वीकार करने का साहस नहीं किया था। उन्हें चिन्ता हुई कि वे क्या उत्तर देंगे। सिकन्दर ने चलते समय यह भी कहा था कि संन्यासी से जोर-जबरदर्स्ती न की जाय। उन लोगों ने बहुत अनुनय-विनय की, किंतु महात्मा जी नहीं गये ।
डरते-डरते सैनिक-अधिकारी सिकन्दर के शिविर में आये । सम्राट् ने जब सुना कि उसके आदेश की अवज्ञा हुई तो नथुने फड़क उठे । महात्मा जी को हाजिर करने के लिये कड़ककर आदेश देने को था कि उसे अपने गुरु अरस्तू की बात याद आ गयी। विश्व-विजय अभियान के पूर्व उसने कहा था कि भारत विचित्र देश है, धन-धान्य और शौर्य से पूरित; किंतु वहाँ वैभव माना जाता है त्याग में, भोग में नहीं । तुम देखोगे कि वहाँ के लोग अध्यात्म - चिन्तनमें अतुलनीय हैं। सिकन्दर ने सोचा कि गुरुकी बात परखने का अच्छा मौका है। आदेश की प्रतीक्षा में खड़े अधिकारियों से गम्भीरता पूर्वक इतना ही कहा कि वह खुद ही जायेगा ।
अगले दिन सैकड़ों घोड़ों, हाथी और सैनिकों के साथ वह महात्मा जी की पर्ण कुटी पर पहुँचा । जाड़े के दिन थे, ठण्डी तेज हवा चल रही थी। वैसे भी पंजाब की सर्दी कड़ी होती है। उसने देखा, वे सिर्फ एक लँगोटी पहने ध्यान में बैठे हैं। वह आगे बढ़ा और अपने सेनापतियों के साथ उनके बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया, फिर भी महात्माजी का ध्यान न टूटा। उनके मुखमण्डलपर ऐसी आभा दिखायी पड़ी कि विश्वविजेता सिकन्दर आत्मविस्मृत-सा देखता रहा । कुछ देर बाद समाधि भंग हुई। उनके सामने भेंट लाये हुए फल-फूल, शाल-दुशाले, रत्नादि सोने के थालों में सजाकर रख दिये गये।
महात्मा जी ने कहा—‘भाई ! ईश्वर के दिये ताजे फल मुझे वृक्षों से हमेशा मिल जाते हैं। माता रावी दूध के समान स्वच्छ जल पीने के लिये दे देती हैं। दिन में भगवान् सूर्य गर्मी पहुँचा देते हैं और रात में कुटी में जाकर वल्कल ओढ़ लेता हूँ। फिर भला, मुझे इन चीजों की क्या आवश्यकता है?'
सिकन्दर ने कहा, 'इतनी ठण्डी हवा चल रही है और आपके शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं, हम पाँच-पाँच गर्म कपड़े पहने हुए हैं, फिर भी सर्दी लग रही है।' महात्माजीका उत्तर था, 'राजन् ! यह तो अभ्यास की बात है; जैसे- तुम्हारी नाक और मुँह को ठण्ड सहने का अभ्यास हो गया है, वही बात मेरे सारे शरीर पर लागू होती है।
सिकन्दर घुटने टेककर उनके पास बैठ गया। वह कहने लगा, 'महाराज! मैंने इतने सारे देश जीते, मेरे पास अपार धनराशि है और असंख्य दास-दासियाँ; फिर भी न जाने क्यों मेरे मन में अशान्ति बनी रहती है और अधिक पानेकी लालसा मिटती नहीं।' महात्मा जी ने उसके ललाट की ओर देखते हुए कहा, 'युवक सम्राट् ! जिसकी तृष्णा मिटी नहीं, वह चाहे कितना ही धनी हो, मनसे भिक्षुक होता है; यह बात तुम्हारे लिये भी है। अपनी महत्त्वाकांक्षा के आवेश में तुमने इस छोटी- सी आयु में कितनी महिलाओं को विधवा किया, कितने बच्चों को अनाथ बनाया, कितने गाँव और खेत उजाड़ दिये, मगर अतृप्त ही रहे ! अब भी तुम्हारे मन में इसी प्रकार की भूल करने की प्रबल इच्छा है, परंतु यह सब किस लिये? ये सारे धन, दौलत, फौज, हथियार तुम्हारे काम नहीं आयेंगे। तुम्हारे जीवन की घड़ी को एक पल भी नहीं बढ़ा पायेंगे।'
सिकन्दर के साथी आश्चर्य कर रहे थे कि जिसके सामने बड़े- से-बड़े पराक्रमी योद्धा, राजा और सम्राट् सिर झुकाते रहे, वह आज एक मामूली फकीरसे हाथ बाँधे कह रहा है कि मेरा भविष्य क्या है, इसे बताने की कृपा करें।
महात्मा जी थोड़ी देर मौन रहे। फिर उन्होंने कहा, 'ऐसा लगता है कि जीवन की उपलब्धियों की सीमा पर अब तुम आ गये हो। इस समय तुम्हारी आयु ३३ वर्ष की है। आज से एक सौ बीस दिन बाद तुम्हारा ऐहिक जीवन समाप्त हो जायगा । दुर्योग से तुम अपने परिवार वालों से भी नहीं मिल पाओगे; क्योंकि तुम्हारी मृत्यु रास्ते में एक गाँव में होगी। जीवन के इस थोड़े से समय को यदि भगवद्भजन और अच्छे कामों में लगा पाओ तो तुम्हें शान्ति मिलेगी। आज तक जोर- जुल्मकर बहुतों से लिया, अब जरूरत मन्दों को, दीन-दुखियों को देने का आयोजन करो। इसी में तुम्हारा कल्याण है। यह शाश्वत सत्य है कि धन और धरती किसी के साथ जाती नहीं। मनुष्य जैसे खाली हाथ आता है, वैसे ही संसार से चला जाता है।'
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