गोगाबापा
राजस्थान के शौर्य और बलिदानों का इतिहास विश्व में बेजोड़ माना जाता है। सम्मान और सतीत्व की रक्षा के लिये बच्चों को गोद में लिये हुए हजारों महिलाओं का धधकती आग में कूद कर प्राण दे देना, अपने-आप में एक अद्वितीय दृष्टान्त है। भारत के सिवा ऐसे उदाहरण शायद ही विश्व में और कहीं मिल पायेंगे। रणथम्भौर और चित्तौड़ में इस प्रकार के कई जौहर हुए हैं। सबसे पहला जौहर बीकानेर के भादरा गाँव के पास गोगामढ़ी में सन् १०२४ ई० में हुआ था। इसमें ७०० कुलवधुएँ अपने बच्चों को गोद में लिये हुए जलकर भस्म हो गयी थीं। जब गजनी की फौज गोगामढ़ी में पहुँची तो उसे राख की ढेरी, कुछ अध जले मांस के लोथड़े और उन पर मँडराते हुए गिद्ध दिखायी दिये थे।
गोगामढ़ी के चौहान सरदार गोगाजी का अद्भुत इतिहास है। यूरोप के १२ वीं शताब्दी के क्रुसेड अभियान के कई-एक नेता, भारत के जयमल, पत्ता और वीर चूड़ावत सरदार के बलिदानों से भी गोगाजी का बलिदान अधिक उज्ज्वल और अनोखा है।
महमूद गजनवी की पचास हजार की सुसज्जित फौज के डर से लोहकोट (लाहौर) और मुलतान के हिन्दू राजा मुँहमें तिनका लेकर अपनी फौज सहित उसके साथ हो गये थे। रास्ते के सामन्तों की बिसात ही क्या थी? मरु भूमि की सीमा पर पहुँचते-पहुँचते उसके पास तीस हजार सवार और पचास हजार पैदल फौज थी।
जहाँ तक सम्भव हुआ, महमूद रास्ते के सामन्तों से समझौता करता हुआ, सोमनाथ की प्रसिद्ध मूर्ति ध्वंस करने के लिये आगे बढ़ रहा था। उसने गुर्जर देश की समृद्धि के बारे में सुन रखा था। वहाँ जाकर सिपाहियों को लूट का लालच था और गजनवी को महादेव की मूर्ति तोड़कर गाजी बनने का। उसे भाटी प्रदेश (इस समय का बीकानेर क्षेत्र) होते हुए जालौर- मारवाड़ के मार्ग से गुजरात-सौराष्ट्र जाना था। रास्ते में गोगामढ़ी थी, वहाँ के वृद्ध सरदार गोगा जी की यशो गाथा उसने सुन रखी थी।
गजनवी ने एक देश-धर्मद्रोही तिलक नामके भारतीय के साथ अपने सेनापति सालार महमूद को गोगाबापा के पास हीरे-जवाहरातों का थाल देकर भेजा। उसने कहा कि अमीर गजनवी अपनी फौजों के साथ आपके क्षेत्र से होकर प्रभास-पाटन जा रहा है, उसे आपकी सहायता चाहिये।
नब्बे वर्ष के गोगाबापा का शरीर क्रोध से काँपने लगा। गम्भीर गर्जन करते हुए उन्होंने कहा- 'तेरा अमीर भगवान् सोमनाथ के विग्रह को तोड़ने जा रहा है और मुझसे सहायता माँगता है! तू हिन्दू होकर उसकी हिमायत के लिये आया है!! जा, अपने मालिक से कह दे कि गोगाबापा रास्ता नहीं देगा।' यह कहकर उन्होंने हीरे मोतियों के थाल को ठोकर से दूर फेंक दिया।
बापा के इक्कीस पुत्र, चौहत्तर पौत्र और सवा सौ प्रपौत्र थे। इनके सिवा उनके पास नौ सौ शूरवीरों की छोटी-सी सेना थी। पन्द्रह दिनों तक तैयारी होती रही। गढ़ की मरम्मत हुई। हथियार सँवारे गये। चण्डीका और महारुद्रका पाठ होने लगा। एक दिन देखा कि गजनवी की फौज एक विशाल अजगर की तरह सरकती हुई गोगामढ़ी से आगे निकल रही है। शायद वह बापा से उलझना नहीं चाहता था।
प्रधान पुजारी नन्द दत्त ने कहा-'बापा ! संकट टल गया है-यवन फौजें आगे बढ़ती जा रही हैं।' बापा की सफेद मूँछें और दाढ़ी फड़कने लगी।
उन्होंने कहा-'महाराज ! हमारे शरीर में रक्त की एक भी बूँदके रहते भगवान् शंकर के विध्वंस के लिये म्लेच्छ कैसे जा सकता है? हम लोग उनका पीछा करेंगे। आप गढ़ी में रहकर महिलाओं और बच्चों की सद्गति कर दें। ऐसा न हो कि उनके हाथों में मेरे वंश का कोई जीवित व्यक्ति पड़ जाय।'
युद्ध की तैयारी के बाजे बजे। घोड़े और ऊँट सजाये गये। केसरिया बाना पहने ११०० वीर हाथों में तलवार, तीर और फरसे लिये हुए गजनवी की सवा लाख फौज का विध्वंस करने चले।
दस वर्ष से छोटे बच्चों और स्त्रियों के लिये एक बड़ी चिता तैयार करके पुरोहित नन्द दत्त ने उसमें अग्नि प्रज्वलित कर दी। उसका अपना जवान पुत्र तो बापा के साथ जूझने चला गया था। पत्नी, पुत्र वधू और बच्चे सब जौहर की आग में कूद गये।
गढ़ के नीचे खड़ी यवन सेना देख रही थी कि तीर की तरह तेजी से केसरिया वस्त्रों में थोड़े-से वीर आ रहे हैं। 'अल्लाह हो अकबर' की गर्जना हुई। हरी पगड़ी और लाल दाढ़ी वाला अमीर हाथी पर चढ़ा हुआ अपनी फौजों को बढ़ावा देने लगा।
नब्बे वर्ष के वयो वृद्ध बापा बिजली की तरह कड़क कर यवन- फौजों का नाश कर रहे थे। एक बार तो गजनवी की फौज में तहलका मच गया, परंतु संख्या का और साज-सामान का इतना अन्तर था कि दो घड़ी में सारे-के-सारे चौहान वीरगति को प्राप्त हो गये। दुश्मन के दस गुने आदमी मारे गये। गोगाबापा के वंश में बच गया एक पौत्र सज्जन और उसका पुत्र सामन्त। वे दोनों महमूद के आक्रमण की अग्रिम सूचना देने प्रभास-पाटन गये हुए थे। वापस आते समय उन्होंने रास्ते में भागते हुए लोगों से सारी बातें सुनीं। एक बार तो वे दुःख से रोने लगे, परंतु जल्दी ही सँभल कर अपना कर्तव्य निश्चित किया। सामन्त तेज ऊँटनी पर चढ़ कर गुर्जर नरेश भीम देव के पास चला गया।
सज्जन चौहान जालौर के रावल से मिलने गये। बहुत समझाने-बुझाने पर भी रावल नहीं माने। उन्होंने कुछ दिन पहले ही गजनवी के दूत को रास्ता देने की स्वीकृति दे दी थी। उनका कहना था कि गुर्जर नरेश भीम देव इतना अभिमानी हो गया है कि हम लोगों को कुछ गिनता ही नहीं। अब जब उस पर संकट आया है तो मैं क्यों उसकी सहायता करूँ? सज्जन ने बहुत कुछ समझाया, 'महाराज ! यह तो भीम देव और आपके वैमनस्यका प्रश्न नहीं है। देश-धर्म पर संकट आया है! इस समय पारस्परिक भेदभाव को भूलकर यवनों का नाश करना चाहिये।' इसपर भी रावल नहीं माना तो व्यर्थ में देर न करके सज्जन ने अपनी ऊँटनी गजनवी की फौजों की तरफ बढ़ा दी। तीन-चार दिन तेजी से चलने पर उसे गजनवी का दूत अपने सैनिकों की टुकड़ी के साथ मिला। सात आदमियों सहित उसको मारकर रावल का स्वीकृति-पत्र, दूतकी कटार और गुप्त निशान लेकर वह गजनवी की फौजों की तरफ बढ़ा। उस समय तक उसकी फौज में तीस हजार घुड़सवार, पचास हजार तीरंदाज और तीन सौ हाथी थे। चार हजार ऊँटों पर केवल रसद और पानी था। इसके पहले इतनी बड़ी फौज किसी भी सम्राट् के पास नहीं सुनी गयी थी। नायक को उसने निशान दिखाया। वह गजनवी के पास ले जाया गया।
एक बड़े तख्त पर अमीर बैठा था। चारों तरफ नंगी तलवारें लिये तातारी सिपाही खड़े थे। सज्जन ने दुभाषिये के माध्यम से बताया कि आपके दूत को रक्षकों सहित जालौर के रावल ने मार दिया है। रावल और मारवाड़ के राजा रणमल्ल की सम्मिलित फौजें लड़ाई के लिये तैयार हैं। निशानी के लिये दूतकी कटार गजनवी के पैरों के पास रख दी। तीन-चार दिन के थके हुए और भूखे चौहान की बातों पर महमूद को यकीन आ गया।
उसने अपना परिचय जैसलमेर के एक जागीरदार के रूप में दिया और कहा कि अगर अमीर चाहें तो वह उन्हें सीधे रास्ते से केवल बीस-बाईस दिनों में सोमनाथ पहुँचा सकता है। उस रास्ते पर किसी प्रकार की रोक-थाम का अंदेशा भी नहीं है। इसके बदले में उसने अपनी जागीर के पास के एक सौ गाँव चाहे। इतनी अच्छी तरह से उसने रास्ते के गाँव और खेड़ों का परिचय दिया कि सेनापति तथा अन्य हलकारे उसकी बात को प्रामाणिक मान गये।
दूसरे दिन गजनवी ने अपनी फौजों को रास्ता बदलने का हुक्म दे दिया। अब वे सीधे कोलायत, बाफ और जैसलमेर के रेगिस्तान होकर जाने लगे। सज्जन अपनी प्रिय ऊँटनी पर सबके आगे चला। चार दिन की यात्रा के बाद हलकारों ने शोर मचाना शुरू किया कि आगे बीहड़ रेगिस्तान है, जहाँ आदमी तो क्या पक्षी भी नहीं जा सकते। सेनापति सालार महमूद ने सज्जन को धमकाया, परंतु वह अपनी बात पर अडिग रहा। वापस जाने में फिर पाँच दिन लगते, इसलिये हिम्मत करके वे आगे बढ़े। पाँच वें दिन दोपहर होते ही सामने भयानक अंधड़ आता हुआ दिखायी दिया। जलती हुई गरम रेत मुँह बाये हुए राक्षसी-सी बड़े वेगसे बढ़ रही थी। चौहान की ऊँटनी जान की जोखिम लेकर तेजी से बढ़ने लगी। पीछे-पीछे महमूद की सेना। थोड़ी देर में ही प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया। गर्म रेतके उमड़ते हुए ढेर-के-ढेर पशुओं और मनुष्यों को अन्धा बनाने लगे। फौज बेतहाशा पीछे लौटी, परंतु प्रलयकारी तूफान की-सी तेजी थके-माँद पशुओं में कहाँ से आती ? दसों हजार ऊँट-हाथी और सिपाही गरम रेत के नीचे दबकर मर गये। जो बचे, उनमेंसे बहुतों को रात में बिलों में से निकले हुए क्रुद्ध काले-पीले साँपों ने डस लिया। ऐसा लगता था कि शिव ने अपने गणों को यवनों की फौज का नाश करने के लिये भेजा है।
वीर चौहान ने भी अपनी ऊँटनी सहित वहीं मरु-समाधि ली।
उसके चेहरे पर उल्लास और आनन्द था कि उसने दुश्मनों को इस प्रकार समाप्त कर दिया।
गोगाबापा और उसके वंशजों की पुण्य कहानी यहीं समाप्त हो जाती है, पर उनका यशोगान उत्तर भारत के हर व्यक्ति की जुबान पर आज भी है। भाद्र मास में गोगामढ़ी में उनकी पुण्य-स्मृति में एक बड़ा-सा मेला लगता है। महमूद ने अपनी बची हुई सेना को सँभाल कर किस प्रकार जालौर-मारवाड़ के रास्ते से सोमनाथ पर हमला किया, यह कथा देश के इतिहास में प्रामाणिक रूप से उल्लिखित है।
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